शिक्षा का उद्देश्य?

Read this article by SBI #YouthforIndia fellow Varun Sharma, who wrote this after visiting Sohaba, which is an extremely interior village at Odisha.


वर्तमान परिवेश में शिक्षा के इंस्ट्रुमेंटल उद्देश्य को नाकारा नहीं जा सकता, इसमें मेरे नज़रिए में कोई दो राय नहीं है. परन्तु अगर हमारी शिक्षा प्रणाली केवल इंस्ट्रुमेंटल उद्देश्य को ही पूर्ण रूपेण प्रोत्साहित करना शुरू कर दे तो यहाँ मुझे अहम् समस्या नज़र आती है. अगर हम शोषित वर्ग की बात करें, चाहे वो आदिवासी हों, दलित हों या मुसलमान हों, आर्थिक गरीबी गहराई तक पैर पसारे है, पर खासतौर पर ग्रामीण तबकों में सांस्कृतिक और चारित्रिक गरीबी अभी भी कम से कमतर है. इन्ही वर्गों में अगर सामाजिक सर्वे करें की इन वर्गों के “शिक्षित” मनुष्य जो शिक्षा के इंस्ट्रुमेंटल उद्देश्य को पा कर आर्थिक गरीबी के चक्रव्यूह से निकल सके उनका समाज में क्या हस्तक्षेप है, तो हम पायेंगे वो अपने समाज और वर्ग से उतनी ही दूरी बना चुके होते हैं जैसे कोई ब्राह्मण अछूत से दूरी बनाता था और काफी हद तक आज भी बनाता है. साथ ही अनजाने में, वर्तमान शिक्षा प्रणाली के बनाये हुए आर्थिक रूप से “सशक्त” ये बन्धु अन्यों को भी इसी रास्ते पर चलने को प्रोत्साहित कर रहे होते हैं, उस रास्ते पर जो हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली ही दिखा रही है, वो तो सिर्फ वाहक हैं. इसके विपरीत कहा जा सकता है, “ये स्वयं की मर्ज़ी का भी तो सवाल है, की कौन क्या करना चाहता है.” पर अगर एक गाँव की बात करें, तो एक रहवासी तो नज़र आये जो वर्तमान शिक्षा प्रणाली से निकल कर तूफ़ान के विरुद्ध मुख कर के खड़ा हो.

दाल-चावल तो आदिवासी स्वयं उगा कर खा ही रहे हैं, इतना आत्मबल उनमें है, समस्या है की हमारे-तुम्हारे जैसे सिस्टम में बैठे और सिस्टम के थोड़े-बहुत जानकार “शिक्षित” लोग वो भी उनसे छीनने में लगे हुए हैं, कभी वैश्वीकरण के नाम पर, तो कभी उनके अपने “विकास” के नाम पर. एक बहुत जीवन्त उदहारण है हरित क्रांति के बाद हमारे क्षेत्रीय बीजों का पूर्ण रूप से लोप, अभी कुछ समय पहले एक रिटायर्ड कृषि अधिकारी से बातचीत हुई थी, उन्होंने कहा की, “अब तो हम रासायनिक उर्वरक और हाइब्रिड बीज के खिलाफ अलख जगा रहे हैं, अच्छा हुआ हम इन आदिवासी क्षेत्रों में उस समय नहीं पहुंचे वरना यहाँ भी यही हाल हो गया होता जो आज पंजाब का हो रहा है.” आदिवासी वर्ग में ही जो “शिक्षित” हो गए हैं वो शोषण के खिलाफ़ लड़ने के बजाय, शोषक के साथ ही जा कर खड़े हो गये, क्योंकि वर्तमान शिक्षा प्रणाली विभिन्न माध्यमों के द्वारा चीख-चीख कर कह रही है, वो माध्यम कभी वैश्वीकरण, कभी माता-पिता, कभी शिक्षक और कभी पुस्तकें ही- की भैया सबसे बड़ा रुपैया- शिक्षा का इंस्ट्रुमेंटल उद्देष्य अकेला रह कर उपरोक्त रूप ले चुका है और शोषक वर्ग के पास पैसा बहुतायत में है ही, चाहे वो टाटा, बिड़ला, अम्बानी कोई भी हो और हमारी “लोकतान्त्रिक” आज्ञाकारी सरकारें. उफ्फ्फ!

सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन लाकर समस्या का जो हल ढूँढने का प्रयास किया जा रहा है, मेरे नज़रिये से वो हल कभी मिलेगा ही नहीं, जैसे कुत्ता भूख लगने पर खुद की ही पूँछ को खाने को दौड़ रहा हो, पर गोल गोल घूमता रह गया बस. मेरा कहने का तात्पर्य है की अकेले ऐसा करने पर समस्या की जड़ हम गलत जगह ढूंढ रहे होंगे, हालांकि ये जगह जड़ के काफी करीब है और मत्वपूर्ण भी. मैं शिक्षा-प्रणाली को, कम से कम इस दौर में, जब मानकीकृत शिक्षा प्रणाली की पहुँच बहुत बढ़ गयी है और सब तरफ साक्षरता के नारे लग रहे हैं, सामाजिक परिवर्तन लाने के बहुत तेज़-तर्रार माध्यम के रूप में देखता हूँ, और यही तो इसके माध्यम से अभी किया भी जा रहा है- हमें हमारे अधिकारों के लिए लड़ने की सोच से दूर करके, भरण-पोषण तक सीमित करके. इस मानसिकता में ही खोट है की पहले आर्थिक रूप से मजबूत बनो फिर अधिकारों की सोचो, आर्थिक प्रणाली में रहने पर जब तक आपके मूल अधिकार सुरक्षित नहीं है, तो ये वक्तव्य हमें पिंजरे में बन्द गोल-गोल घूमने वाले तोते सा बनाने का प्रयास नज़र आता है. उदहारण चाहिये, तो काशीपुर-उड़ीसा में आदिवासियों के विरोध की सच्चाई उठा कर पढो, मेरा मतलब और सहज तरीके से समझ पाओगे. परिवर्तन की लहर दोनों ओर चाहिये-शिक्षा प्रणाली और सामाजिक ढांचे में. अकेले सामाजिक ढाँचे में, या अकेले शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन के प्रयास निरर्थक होंगे, क्योंकि समानान्तर हमारे विद्यालयों में या हमारे सामाजिक ढांचों में जड़ मनुष्य तैयार होते रहेंगे. रही भाषा की बात, तो संस्कृति और भाषा को बांधा नहीं जा सकता पर विज्ञान के दौर में जब ये एकदम स्पष्ट है की बच्चा मातृभाषा में जल्दी और अच्छे से सीखता और सोचता है, को आगे बढ़ने ही नहीं दिया जा रहा है. हर भाषा को आर्थिक कारणों से जोड़ना सम्भव नहीं है पर, हर भाषा को मानकीकृत या गैर-मानकीकृत रूप से कक्षा में जगह देना पूर्णरूपेण सम्भव है, बस प्रयास राजनीतिक और बहुसंख्यक वर्ग के कारण जो की शिक्षा का सिर्फ इंस्ट्रुमेंटल रूप ही चाहते हैं, जो की उनके पक्ष में भी है, के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहा है.

जैसे हम आज छात्र-केन्द्रित शिक्षण पर ध्यान दे रहे हैं वैसे ही शिक्षा-प्रणाली को- अधिकार केन्द्रित, तर्क केन्द्रित, क्षेत्र केन्द्रित और इंस्ट्रुमेंटल उद्देश्य केन्द्रित बनाने के प्रयास किये जाने चाहिये. ये मैं कोई नई बात नहीं कह रहा हूँ, NCF-2005 चीख-चीख कर यही बातें कह रहा है, पर हम संस्कृत को “तीसरी भाषा” और गीता को “राष्ट्रिय कृति” बनाने के प्रयसों में उलझे हुए हैं. इन सबसे ऊपर उठना होगा, वर्ना तैयार रहो अन्धे समाज में अल्प दृष्टि वाले बनने के लिए.

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About SBI Youth For India

SBI Youth for India is a fellowship programme initiated, funded and managed by the State Bank of India in partnership with reputed NGOs. It is a movement for India's best young minds who are passionate about fuelling positive change in India. It provides a framework for India's best young minds to join hands with rural communities, empathise with their struggles and connect with their aspirations.
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